Monday, July 2, 2018

विचारणीय पहलू
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मंदसौर में मासूम बेटी के साथ हैवानियत और अमरीका के अफसर को 50 वर्ष की सज़ा !
   मंदसौर में एक मासूम बेटी के साथ फिर से हैवानियत भरा दुराचार हुआ. आये दिन होने वाले ऐसे दिल दहला देने वाले हैवानियत भरे अपराधों के बाद भी क़ानून बनाने वाले महामहिमों ने कोई सबक नहीं लिया.
   दिल्ली के 'निर्भया काण्ड' के बाद भी क़ानून बनाने वाले जिम्मेदार लोग कुर्सियों के खेल में इतने मस्त रहे कि वे बलात्कार,ख़ासकर मासूम बच्चियों के साथ होने वाले हैवानियत भरे दुराचार जैसे सबसे बड़े अपराध की शीघ्र जांच करवा कर दूध का दूध और पानी का पानी कर अपराधी को मृत्युदंड दिलवाने का क़ानून नहीं बना पाए! क्या बलात्कार,खासकर मासूम बच्चियों के साथ हुयी ज्यादती से ज्यादा बड़ा भी कोई अपराध हो सकता है? देश की तो छोडिये, इस तरह के अपराधों के लिए राजस्थान के हर जिले में जो पॉक्सो कोर्ट खुल जाने चाहिए थे,वे भी अभी तक नहीं खुल सके! ये सरकार की असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है? 'बेटी बचाओ-बेटी पढाओ' का नारा बुलंद करने वाली सरकारों को सत्ता के खेल खेलने से बाज़ आकर इस देश की बेटियों की हिफाज़त के बारे में पहले सोचना चाहिए. दिल्ली के 'निर्भया काण्ड' के बाद भी इस देश में ना जाने कितनी 'निर्भयाएं' उसी तरह की हैवानियत की शिकार हो चुकी है,किन्तु क़ानून बनाने वाले पता नहीं क्यों नींद से नहीं जागते!अगर वे नींद से जागते भी हैं तो दुर्भाग्यवश राजनीति का चश्मा लगा कर ही इन अपराधों को देखते हैं!बेटी,बेटी होती है,उसकी कोई जाती-धर्म नहीं होता और उसके साथ होने वाली ज्यादती को सिर्फ न्याय की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए. ऐसे अपराधों को अंजाम देने वाले की सज़ा सिर्फ मृत्युदंड होनी चाहिए,चाहे अपराधी नाबालिग ही क्यों ना हो! सच तो ये है कि नाबालिग ऐसा अपराध कर ही नहीं सकता, और जो करता है, वो उम्र से भले ही नाबालिग हो, मस्तिष्क से वो बालिग़ से भी ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि वो जानता है कि लचर क़ानून के कारण वो गंभीर से गंभीर अपराध करके भी 'नाबालिग' की आड़ लेकर बच निकल सकता है!
   कईं मुस्लिम देशों में तो इस तरह के अपराध में लिप्त अपराधी को चौराहे पर गोली मार कर लटका दिया जाता है. हालांकि हम सज़ा के ऐसे किसी बर्बर तरीके को जायज़ नहीं ठहराते, किन्तु इतना तो चाहते ही हैं कि इस किस्म के गंभीर अपराध में लिप्त अपराधियों को जल्दी से जल्दी सजा-ए-मौत मिले. कईं देशों में ऐसे अपराधों की त्वरित जांच होती है और अपराधियों को मृत्युदंड तक दिया जाता है. हमारे देश में भी इस तरह के अपराधों की जांच को प्राथमिकता देनी चाहिए और महीने दो महीने में ही जांच पूरी कर अगर अपराध सिद्ध हो जाए तो अपराधी फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए.ऐसे अपराधों को रोकने का एकमात्र यही तरिका है. हैवानों पर रहम दिखाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता,ये सिद्ध हो चुका है.
   दूसरी खबर आई है अमरीका से. वहां के एक अफसर को 50 साल की कैद की सज़ा हुयी, इसलिए कि वो अफसर बच्चों को बाँटें जाने वाले खाने को बेच कर पैसा बनाता रहा और बच्चों को उससे वंचित रखा! यानी वो अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त था.
   हालांकि इन दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं है,किन्तु इन घटनाओं को देख कर अपनी क़ानून व्यवस्था पर जरूर तरस आता! अगर हमारे यहाँ के न्यायालय भी दूसरों का हक़ मार कर अपना घर भरने वालों को जेल भेजने लग जाएं तो सोचिये कि यहाँ कितनी जेलें बनानी पड़ेगी? बच्चों का पोषाहार, गरीब का राशन, विधवा की पेंशन, ऑफिस की स्टेशनरी तथा सड़कों और पुलों का सीमेंट आदि आदि डकारने वाले क्या हमारे यहाँ कभी जेल की हवा खा सकते हैं?? अगर खा सकते तो आज हिन्दुस्तान इतना बदहाल नहीं होता! एक हमारा देश हैं जहां मासूम बेटियों के साथ दुराचार करने वाले कईं हैवान किन्तुओं-परंतुओं और कानूनी दांवपेंचों के चलते सजा से बचते रहते हैं और एक अमरीका जैसा देश हैं जहां एक घपलेबाज़ अफसर अपने भ्रष्ट कारनामों के कारण 50 वर्ष की जेल भुगतता है! हमारे क़ानून बनाने वालों और उसकी पालना कराने वालों पर ये करारा तमाचा नहीं तो और क्या है?
   सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव,और अवाम में मज़बूत सामूहिक शक्ति से न्याय की मांग के अभाव ने 'दरिंदों' और 'लुटेरों' के हौसले बुलंद किये हैं, और आज उसी का परिणाम है कि बेटियाँ और भारत माता लूटी जा रही है. सरकारों को अब राजनीति और सत्ता के खेल से ऊपर उठकर जागना होगा और अगर ना जागे तो अवाम को मज़बूत सामूहिक शक्ति से न्याय की मांग करते हुए सरकारों को कॉलर पकड़ कर झंझोडते हुए जगाना पडेगा, ताकि इस देश की बेटियाँ और भारत माता दोनों सुरक्षित रह सके. 
(टिप्पणी के रूप में आपके विचार अपेक्षित हैं)

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