Sunday, April 7, 2019

 'इन्हें ' हराना है, तभी देश जीतेगा !
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       देश में चुनावों का मौसम है. अप्रेल में जैसे-जैसे        तापमापी का पारा बढ़ रहा है,वैसे ही चुनावी सरगर्मी भी बढ़ रही है.इधर मौसम विभाग धूल भरी आंधियों की भविष्यवाणी कर रहा है,इधर राजनीतिक दल वादों और दावों का अंधड़ उड़ा रहे हैं.कुल मिलाकर देश हर तरह से तपिस की चपेट में है,जिसका ज्यादा असर आम अवाम पर ही हो रहा है.
     चुनाव कोई नई बात नहीं है.भारत जैसे महादेश में हर महीने ही कहीं ना कहीं कोई ना कोई चुनाव होता ही रहता है.इन चुनावों में भी बेशक ये दल या वो दल जीतेगा,कुर्सी पर बैठेगा,सत्ता संभालेगा और देश को अपने तरीके से चलाएगा. लेकिन कुछ सवाल दशकों से जैसे हैं,वैसे ही बने रहेंगे.इस देश की यही त्रासदी है!
    माफ कीजिये,मैं किसी दल विशेष का कार्यकर्ता नहीं हूं जो कि अपने दल को जिताने और दूसरे दलों को हराने की अपील करूं. एक जागरूक नागरिक होने के नाते मैं चाहता हूं कि हम सभी मिलकर देश में सर्वत्र व्याप्त उन समस्याओं को हराएं, जो हमें तरक्की नहीं करने दे रही,जो जरूरतमंदों का हक़ मार रही है,जो अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है,जो कर्तव्यों को दफन कर चुकी है,जो देश में यथास्थिति का पोषण कर रही है,जो परमार्थ का लबादा ओढ़ कर स्वार्थ साधने में लगी है!
    समझदारों को इशारा ही काफी है.मैं बात कर रहा हूँ भ्रष्टाचार, बेईमानी, कामचोरी, स्वार्थसिद्धि,चारसौ बीसी जैसी समस्याओं की,जो कि हमारे सिस्टम का एक अनिवार्य अंग सी बन गयी है! चुनाव चाहे जो पार्टी जीते,इन समस्याओं को दशकों से आज तक कोई हरा नहीं पाया है!इसे सत्तासीन पार्टी में इच्छाशक्ति की कमी या निहित स्वार्थ कह सकते हैं और अवाम की कमजोरी भी! यही कारण है कि आज़ादी के बाद से आज तक भी अवाम कई ऐसी समस्याओं से रु-ब-रु हो रहा है,जिन्हें खत्म किया जा सकता था! इन समस्याओं ने अवाम और देश की तरक्की को धीमा ही नही किया,अपितु लोकतंत्र का भी मजाक उड़ाया है!
     चुनाव के दिन हम सभी वोट देंगे,और बेशक हमें अपने मताधिकार का प्रयोग हर हाल में करना ही चाहिए,क्योंकि ये अधिकार से ज्यादा एक कर्तव्य है,किन्तु अवाम के रूप में हमे देशहित में हमेशा ही जागरूक रहना पड़ेगा ताकि उपरलिखित समस्याओं का खात्मा हो सके और एक मजबूत,वास्तविक लोकतंत्र,जिसमें सबसे नीचे की पायदान पर खड़े आदमी को संविधान प्रदत्त हर अधिकार सहज रूप से मिल सके,प्राप्त किया जा सके.
-अशोक पुनमिया 

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